Thursday, June 3, 2010
Tuesday, June 1, 2010
| हे माँ वर दे! डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
अकस्मात आवाज़ गूँजी -
"शरीफ साहब" मंच पर आइये।
चारों ओर देखा,
शायद कोई और भी शरीफ हो।
पर, मेरा भ्रम था।
तालियों की गूँज में, साहस कर,
जा बैठा मंच पर।
बड़े बड़े महारथी विराजमान थे।
कुछ मुँह बनाये, कुछ बेज़ार थे।
फिर मेरी बारी आई
और पढ़ना प्रारंभ किया -
"कागा सब उड़ जाइयो,
तुम खाइयो नहीं माँस।
चोंच भी नहीं मारियो,
मोहे पिया मिलन की आस।।"
साहित्य के महारथी क्रोधित हुए,
शेम, शेम के नारे लगाये।
आवाज़ आई - शरीफ साहब शर्म करें,
अमीर ख़ुसरो की "ज़मीन" इस्तेमाल न करें।
ज़मीन! अपनी ज़मीन कहाँ से लाऊँ?
मैं तो प्रवासी हूँ, शरणार्थी हूँ!!
अपनी ज़मीन, अपनी माँ को छोड़ आया हूँ!
वैसे भी यहाँ कौन अपनी "ज़मीन" पर घर बना रहा है?
जिसकी अपनी ज़मीन है वह भी -
दूसरों की ज़मीन, भावों, सोच-विचारों पर
महल बना रहा है।
मैं उन सपूतों की बात नहीं कर रहा
जिन्होंने ज्योति प्रदान की!!
जब भी ’कलम’ उठाता हूँ
अपनी लेखनी, हर पंक्ति पर,
पूर्वजों के भाव-विचार नज़र आते हैं।
कोई नई शकुन्तला, कामायनी, गीताजंली
कैसे लिखूँ?
शब्दों के दाँव-पेच, उलट-पुलट, जादूगरी से
कब तक मन बहलाऊँ!!
अपने पुत्रों को नये विचार
नई शकुन्तला, कामायनी, गीताजंली दे!
हे माँ वर दे!
| सत्यम् शरणम् गच्छामि डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
हमने पूछा--
कहाँ महाराज?
कहा--
सत्य की तलाश में!
पहिचानोगे कैसे?
चुप रहे,
अन्यमनस्क, विचलित से,
कहना चाहा, कह न सके।
हमने कहा-
सत्य तो निराकार है!
वह एक है,
निराधार एवं सर्वाधार है!
उसकी कोई संतान नहीं,
न वह किसी की संतान है!
कोई उसके बराबर नहीं!
सब प्रशंसा उसी के लिए है!
सारे संसार का पालनहार है!
अत्यन्त कृपाशील एवं दयावान है!
"अंतिम न्याय" के दिन का मालिक है।
सब उसी की बंदगी करते हैं।
उसी से मदद माँगते हैं!
वही सीधा मार्ग दिखाता है!
हर जगह विराजमान है!
जल में, थल में।
अवनी और अम्बर में।
तुझमें - मुझमें!
वह तो स्वयं कहता है--
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो,
मत्त: स्मृतिर्ज्ञनमपोहनं च।
वह हमारे इतने क़रीब है, कि,
हम देख नहीं पाते।
उसने सारे संसार की सृष्टि की।
हर युग में अपना
प्रतिनिधि भेजा।
यही सत्य है!!
सत्यम् शरणम् गच्छामि!
ईश्वरम् शरणम् गच्छामि!
| मज़ार डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
बस्ती से दूर,
सुनसान जंगल में,
थी एक ’मज़ार’।
सोचा चलकर ’ज़ियारत’ करें,
विनती करें बिगड़ी बनाएँ।
एक लम्बा रास्ता तै कर,
पहुँचा जब ’मज़ार’ पर!
पर यह क्या!!
एक स्त्री-पुरुष, वस्त्रहीन,
आमोद-प्रमोद में लीन!
व्यस्थ थे!!
यह देख मन विचलित हो गया।
आशाओं पर पानी फिर गया।
मैंने सोचा --
जब इन दुष्टों को यह रोक नहीं सकते,
तो मेरा क्या उद्धार करेंगे?
लौटा मैं वापस, निर्धूत मन लिए,
बग़ैर दुआ माँगे!
रास्ते में एक पेड़ के नीचे,
किया विश्राम कुछ देर,
अक्समात लग गई आँख।
स्वप्न में देखा --
संबोधित हैं एक बुज़ुर्ग -
"मुझसे मिले बग़ैर चले आये?"
मैंने साहस कर दिया जवाब -
"हज़ूर, अपने पास हो रहे
कुकर्म को रोक नहीं सकते
तो मेरे लिए क्या करेंगे?"
’बुज़ुर्ग’ मुस्कुराए और कहा --
"इस नीली छतरी के नीचे
क्या नहीं हो रहा?
जब वह नीली छतरी वाला
सब कुछ देख कर अनजान है,
फिर मैं ते उसका
एक अदना ’ग़ुलाम’ हूँ!
तू अपना काम कर
दुष्टों को अपना काम करने दे।"
और
वापस दौड़ पड़ा ’मज़ार’ की
जानिब!!
| ताज़ा हवा डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
दूर रह कर भी उसको भुला न सका,
उसकी यादें मेरी ज़िन्दगी बन गई,
रेखाओं से रेखाएँ मिलाता रहा,
हाथ रुका तो उसकी छबी बन गई
मैंने गोकुल में ढूँढा, गरुकुल में ढूँढा,
ना राधा मिली, ना मीरा मिली,
आँख झपकी तो उसने पुकारा मुझे,
आँख खोला तो, ताज़ा हवा बन गई
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
हम भी शामिल थे उसकी रुसवाई में
जो होना था, वह तो हो ही गया
दिल की धड़कन मेरी आरज़ू बन गई
मैं भटकता रहा बादलों की तरह
कभी गरजता, तो कभी बरसता रहा
सिसकियों से उतारा, लहद में उसे
मुँह से पर्दा हटा, रौशनी हो गई
| इस पार - उस पार डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
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इस पार सुरा, सुर है, वोह है, इस पार माँ के क़दमों तले, इस पार की पावन धरती में, |
| हमवतनों से डा. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़ |
वही आज पत्थर की मूरत बने हैं।
सही हमने जिनके लिए सारी ज़िल्लत,
वही हम-वतन पीठ फेरे खड़े हैं।
चढ़या फ़लक़ पे जिन्हें हमने अक्सर,
बहारों के नग्में सुनाये थे अक्सर।
ज़माने की दो-रंगी चालों में आकर,
वही ले के ख़ंजर आगे बढ़े हैं।
अमन की भला कौन बातें करे,
इन्हें ’पेट भरने’ की फिक्र है लगी।
ज़बानों का परचम लिए हाथ में,
इन्हें अपने ’मतलब’ की फिक्र है लगी।
ज़रा तो सोचे, ऐ नफ़रत करने वालो,
हम भी इन्साँ हैं, अपना बना लो।
यही वक़्त है मैल दिल से निकालो,
सम्भालो सम्भालो वतन को सम्भालो।
